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Share Market Basic to Advance Knowledge in Hindi For Beginners ( शेयर मार्केट कैसे सीखे? पार्ट 1)

नमस्कार दोस्तों! पिछली पोस्ट में आप सभी ने जाना की शेयर मार्केट क्या होता है? ( Share Market Kya Hai in Hindi ), शेयर मार्केट कैसे काम करता है? ( Stock Market Kaise Kam Karta Hai in Hindi ), शेयर क्या होता है? ( Share Kya Hai ),  शेयर मार्केट से पैसा कैसे कमाए? ( Share Bazaar Se Paisa Kaise Kamaye ) बगैरा बगैरा  बगैरा...... ! आज हम इस टॉपिक में चर्चा करेंगे की शेयर मार्केट (Share Market Basics to Advance Knowledge in Hindi For Beginners ) में हमें किस तरह से निवेश करना चाहिए 


तथा Share को Buy करते समय हमे कंपनी और शेयर के बारे में क्या- क्या पता होना चाहिए! से संबंधित जानकारी शेयर करेंगे। आपसे अनुरोध है कि आपको पोस्ट को आखिरी तक पढ़ना है। पोस्ट को अंत तक पढ़ने के बाद आपको शेयर बाजार से संबंधित बहुत सी जानकारी ( Share Bazaar Advance Knowledge in HIndi ) के बारे में पता चल जाएगा।

Share Market Basic to Advance Knowledge in Hindi For Beginners, शेयर मार्केट कैसे सीखे?, IPO, FPO और Volume Kya Hota Hai, शेयर कितने प्रकार के होते है, How to learn share market, Trading और Demat Account क्या है?, How many Types of Share in Hindi, IPO या FPO को लाने का कारण क्या है?, SEBI Kya Hai in Hindi ( What id SEBI? ), Equity Kya Hai?, Commodity Kya Hai?,
Share Market Kaise Sikhe in Hindi





Share Market Basic to Advance Knowledge in Hindi For Beginners


शेयर मार्केट को समझना कोई मुश्किल विषय नहीं है, जैसा कि आप सोच रहे हैं और कोई भी स्टॉक मार्केट बेसिक टू एडवांस इन हिंदी सीख सकता है फिर चाहे आप छात्र या युवा पेशेवर हो या फिर आप हाउसवाइफ हो सकती है आपकी उम्र या स्थिति जो भी हो आप Stock Market में निवेश करना आसानी से सीख और समझ सकते है!



शेयर मार्केट कैसे सीखे? ( How to learn share market? )


अगर आप स्टॉक मार्केट में नए है और आप शेयर मार्केट कैसे सीखे? जानना चाहते है तो मै आपको आज इस लेख के माध्यम से शेयर मार्केट की Basic Knowledge से Advance Knowledge in Hindi की जानकरी आपको सरल और आसान भाषा में देने वाला हूँ वो भी Steps By Steps जिससे की आपको अच्छे से समझ में आये! 

मेरा यही प्रयास रहता है की मै जो भी जानकारी आपके साथ शेयर करू उससे आप अच्छे से समझ सके और आपको पूरी जानकारी एक ही जगह पर मिल जाये ताकि आपको कही और से खोजने की आवश्यता ना पड़े जिससे आपका समय भी बचेगा और आपको अपनी जानकारी एक ही जगह मिल जाएगी !

इस लेख में आपको शेयर मार्केट से जुडी काफी चीजे सीखने को मिलेगी जैसे कि शेयर कितने प्रकार के होते है? ( How many Types of Share in Hindi ), IPO Kya Hota Hai? ( IPO क्या है? ), FPO Kya Hota Hai? ( FPO क्या है? ),  Trading और Demat Account क्या है?, Equity और Commodity Kya Hai ), Stock Market Me Volume Kya Hota Hai? और भी बहुत कुछ! तो समय बर्बाद न करते हुए तो चलिए जानते है इन सब के बारे में -



शेयर कितने प्रकार के होते है? ( How many Types of Share in Hindi? )


जैसा की आप सभी लोग जान चुके है की शेयर क्या होता है? लेकिन जिन लोगो ने पिछली पोस्ट नही पढ़ी या नही जानते की What is Share?  तो उनको मै बता दू शेयर का मतलब होता है हिस्सा, जब आप किसी भी कंपनी के शेयर खरीदते है जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड होती है तब आप उस कंपनी में हिस्सेदार हो जाते है 

मतलब अगर कंपनी को प्रॉफिट होगा तो शेयर के दाम बढ़ेगे और यदि कंपनी को घाटा होता है तो शेयर के दाम घाटगे! आसान शब्दों में कहू तो Company प्रॉफिट में तो आप प्रॉफिट में अगर Company lose में तो आप लॉस में, तो इसलिए जब भी कोई किसी कम्पनी के शेयर Buy करता है तो वह कम्पनी के बारे में अच्छे से रिसर्च करता है कम्पनी का फंडामेंटल चेक करता है! 

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा की ये सब कैसे देखते है, कैसे चेक करते है तो आप निराश मत होईये हम आपको सब बताएगे स्टेप्स बाय स्टेप्स, तो पहले जानते है की Share Kitne Prakar ke Hote Hai in Hindi-

भारत में मुख्य रूप से तीन तरह के शेयर होते है जिन्हे आप नीचे देख सकते है हम हर एक शेयर के प्रकार के बारे में अच्छे से समझायेगे।

  1. इक्विटी शेयर (Equity Share)
  2. प्रेफेरेंस शेयर (Preference share)
  3. डीवीआर शेयर (DVR Share)

इक्विटी शेयर (Equity Share):- इक्विटी शेयर , शेयर का सबसे पोपुलर प्रकार है आम तौर हम जिन शेयर की बात करते है, वो Equity Share ही होते है इस प्रकार के शेयर को Ordinary Shares के नाम से भी हम जानते है! स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड कंपनी जब अपना शेयर इशू करती है तो उन शेयर को equity share कहा जाता है लेकिन हम इक्विटी शेयर कहने के बजाये सिर्फ शेयर कहते है!

इस प्रकार के शेयर जिसके पास में होता है उसे कंपनी का मालिक कहा जाता है क्योकि कि शेयर धारक कंपनी का आंशिक हिस्सेदार होता है तथा कंपनी के मुनाफे-नुकसान से जुड़ा रहता है । Equity Share धारक ही इक्विटी शेयर होल्डर होते हैं। 


यह शेयर स्टॉक मार्केट में बांकी अन्य Share की तुलना में सबसे ज्यादा ट्रेड होते है क्योंकि यह शेयर लगभग सभी कंपनी के द्वारा इशू किये जाते है! Equity Share जिसके पास में होता है उसे Company में किये जानेवाले Management के फैसले में Vote देने का अधिकार होता है साथ में इन शेयर होल्डर्स को डिविडेंड प्राप्त करने का अधिकार भी होता हैं।

इसी प्रकार, ये कंपनी से जुड़े रिस्क तथा मुनाफे तथा नुकसान के हिस्सेदार भी होते हैं। यदि कंपनी अपना व्यवसाय पूर्ण रूप से समाप्त करती है, तब कंपनी अपनी सारी देनदारी चुकता करने के बाद बची हुई पूँजी संपत्ति को इन Equity Share Holder को उनकी शेयर संख्या के अनुपात से वितरित करती है। Stock Exchange में लोग सबसे ज्यादा Equity Share पर ही इन्वेस्ट और ट्रेडिंग करते है!


प्रेफेरेंस शेयर (Preference share):- शेयर बाजार में इक्विटी शेयर के बाद परेफरेंस शेयर का नाम बहुत चलता है , परेफरेंस शेयर और इक्विटी शेयर इन दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है जैसा की इनके नाम से ही पता चल रहा है इन शेयर होल्डर्स को साधारण शेयर होल्डर की अपेक्षा कुछ विशेष अधिकार पहले से निश्चित होते है साधारण शेयर के विपरीत कंपनी चुनिंदा निवेशकों, प्रोमोटरों तथा दोस्ताना निवेशकों को नीतिगत रूप से प्रिफरेंस शेयर जारी करती है। 

प्रेफरेंस शेयर धारकों को डिविडेंड देने में प्राथमिकता दी जाती है। परन्तु इनको मिलने वाला लाभांश निश्चित रहता हैं मतलब Preference share (प्रेफेरेंस शेयर) के केस में Preference shareholder को हर साल कितना लाभांश दिया जायेगा, ये पहले ही तय होता है, प्रेफेरेंस शेयर होल्डर को वोट देने का अधिकार नहीं होता है, ये सबसे बड़ा फर्क है इक्विटी और प्रेफेरेंस शेयर में! 

प्रिफरेंस शेयर होल्डर साधारण शेयरधारक की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होते हैं, क्योंकि जब कभी कंपनी बंद करने की स्थिति आती है तो प्रेफरेंस शेयर होल्डर्स को सबसे पहले भुगतान किया जाता है। कंपनी अपनी नीति के अनुसार Preference shares को आंशिक अथवा पूर्ण रूप से Equity Share में परिवर्तित भी कर सकती है। जब कोई कंपनी बहुत अच्छा बिजनेस कर रही है तो उसके Equity Share Holder को ज्यादा फायदा होता है 


बजाय Preference Shares Holder के क्योकि इन्हें कंपनी का हिस्सेदार नहीं माना जाता है। आज के समय में प्रेफेरंस शेयर के बजाये कोई भी कंपनी इक्विटी शेयर इशू करने में ज्यादा रूचि रखती है इसलिये अधिकतर लोग Preference Share के मुकाबले Equity Share को ज्यादा पसंद करते है। लाभ के आधार पर प्रिफरेंस शेयर चार तरह के होते हैं- 

  • Non-cumulative Preference Share( नॉन क्यूमुलेटिव प्रिफरेंस शेयर ):- इस प्रकार के शेयर होल्डर्स को बस कंपनी के लाभ कमाने की स्थिति में ही Dividend प्राप्त करने का अधिकार होता हैं। मतलब यदि कंपनी किसी कारणवश पहले वर्ष लाभ नहीं कमाती है और दूसरे वर्ष में लाभ कमाती है तो इस स्थिति में निवेशक दोनों वर्ष में लाभ प्राप्त करने का दावा नहीं कर सकता है।

  • Cumulative Preference Share( क्यूमुलेटिव प्रिफरेंस शेयर ):- इस प्रकार के शेयर होल्डर्स को कंपनी के नुकसान की स्थिति में डिविडेंड का भुगतान नहीं होने पर Dividend का एरियर प्राप्त करने का अधिकार होता हैं मतलब यदि कंपनी किसी वजह से पहले वर्ष लाभ नहीं कमाती और दूसरे वर्ष में लाभ की स्थिति में आती है तो इस स्थिति में निवेशक दोनों वर्ष लाभ प्राप्त करने का दावा कर सकता है।

  • Convertible Preference Share( कन्वर्टिबल प्रिफरेंस शेयर ):- जैसा की आपको इसके नाम से पता चल रहा है इस प्रकार का शेयर होल्डर अपने शेयर्स को निश्चित अवधि के पश्चात्‌ उसी कंपनी के किसी अन्य वित्तीय इंट्मेंट में बदलबा सकते है कहने का तात्पर्य है कि इस प्रकार के शेयर होल्डर्स के पास अधिकार होता है कि वे अपने परफेरेंस शेयर्स को इक्विटी शेयर में कन्वर्ट करा सकते हैं।

  • Redeemed Cumulative Preference Share( रिडीम्ड क्यूमुलेटिव प्रिफरेंस शेयर ):- इस तरह के Share Holder को उसकी पूँजी निश्चित समय के बाद लाभांश (Dividend) के साथ लौटा दी जाती है। इस प्रकार के शेयरधारक का कंपनी से जुड़ाव पूरी तरह अल्पकालिक होता है और कंपनी की इच्छा पर निर्भर करता है। 

DVR Share( डी वी आर शेयर क्या है ):- DVR का Full Form होता है Shares with Differential Voting Rights, इस तरह के शेयर इक्विटी और परेफरेंस शेयर दोनों का मिला जुला रूप है डी वी आर शेयर होल्डर को इक्विटी शेयर कि तरह लाभ तो मिलता है 

लेकिन उसकी तरह वोटिंग राइट्स नहीं मिलते है ऐसा नहीं है कि DVR Share Holder वोटिंग नहीं कर सकता , डी वी आर होल्डर वोटिंग कर सकता है लेकिन इक्विटी शेयर होल्डर की तरह से पूरी तरह वोटिंग का अधिकार नहीं होता! 

DVR Share Holder को Equity Share Holder की अपेक्षा कम वोटिंग राइट होते हैं। उसके voting rights सुनिश्चित होते है . यही कि उसको जहाँ वोटिंग करने का अधिकार दिया जाएगा वही डी वी आर शेयर होल्डर वोटिंग कर पायेगा इसलिए डी वी आर शेयर Equity और Preference Share से अलग है! कंपनी DVR Share Holder को अतिरिक्त Dividend देती है लेकिन वोटिंग राइट कम होने की वजह से इन Shares की कीमत भी कम होती है।


आशा करता हूँ कि अब आप Share के बारे में अच्छे से जान गये होंगे Share Kya Hota Hai or Kaise Kaam Karta Hai in Hindi तथा ए भी जान गये होंगे कि शेयर कितने प्रकार के होते है हिंदी में, लेकिन क्या आपको पता है की कोई भी शेयर Share Market में लिस्टिंग से पहले उसका आईपीओ ( IPO ) आता है, 

जब कोई शेयर Stock Exchange पर लिस्टेड हो जाता है तो कम्पनी कुछ सालो बाद उसका FPO भी लाती है! ये सब पढने के बाद अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि ये IPO और FPO क्या है?, इसका मतलब क्या है? आपके इस सवाल का जवाब भी हमने नीचे दे रखा है, 


आपको यह शेयर मार्केट से जुड़े सारे सवालों के जवाब मिलेंगे बस आपको धैर्य के साथ इस लेख को अंत तक पढना है तो चलिए जानते है कि IPO Kya Hai in Hindi, FPO Kya Hai in Hindi और IPO, FPO Full Form In Hindi-





IPO Kya Hai in Hindi ( What is IPO? )


IPO का फुल फॉर्म “Initial Public Offering” होता है, जो किसी कंपनी के इक्विटी शेयरों की पहली सार्वजनिक पेशकश है आईपीओ के जरिये कोई कंपनी अपने शेयर्स को आप पब्लिक के लिए ऑफर करती है! जब एक कंपनी अपने समान्य स्टॉक या शेयर को पहली बार जनता के लिए जारी करता है तो उसे आईपीओ, इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (सार्वजनिक प्रस्ताव) कहते हैं। 

IPO एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक प्राइवेट कंपनी अपने स्टॉक्स आम जनता को ऑफर करते हुए पब्लिक होती है। कंपनी अपने शेयर्स जनता को देती है जो कंपनी अपने शेयर्स जनता को ऑफर करती है उसको Issuer के नाम से जाना जाता है। 


Issuer अपने शेयर्स एक इन्वेस्टमेंट बैंक की सहायता से ऑफर करती है। IPO के बाद कंपनी के शेयर्स की ट्रेडिंग ओपन मार्किट में शुरू हो जाती है। ज्यादातर कंपनी IPO में नए शेयर जारी किये जाते है, लेकिन कुछ मामलो में Public Offer के जरिये पुराने Shares भी बेचे जाते है पुराने शेयर की बिक्री को ऑफर फॉर सेल ( OFS ) कहा जाता है!

IPO ज्यादातर नई कंपनियों द्बारा जारी किए जाते हैं जो अपने व्यापार को बढाने के लिए पूँजी (capital) इक्ठ्ठा करती हैं आईपीओ कंपनी को बहुत सारा पैसा जुटाने की सुविधा प्रदान करता है। इससे कंपनी को विकसित होने और विस्तार करने की अधिक क्षमता मिलती है। बढ़ी हुई पारदर्शिता और शेयर लिस्टिंग की विश्वसनीयता उधार लेने वाले फंडों के साथ-साथ बेहतर शर्तों को प्राप्त करने में भी मदद करती है। 


कोई भी कंपनी अपने आईपीओ को लॉन्च करने के बाद अपने शेयरों को सेकेंडरी मार्केट में ले आती है. सेकेंडरी मार्केट को एक्सचेंज ट्रेडेड मार्केट भी कहा जाता है सच्चाई यह है कि सेकेंडरी मार्केट ट्रेडिंग को ही मुख्य रूप से Stock Market ( शेयर मार्केट ) के नाम से जाना जाता है


FPO Kya Hai In Hindi ( What Is FPO? )


FPO का फुल फॉर्म “Follow-on Public Offering” होता है FPO फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) को दूसरा पब्लिक ऑफर भी कहा जाता है। कम्पनी के शेयर Stock Exchange पर लिस्टिंग होने के कुछ साल बाद FPO आता है 

कहने का मतलब है कि शेयर बाजार में पहले से शामिल या कहें सूचीबद्ध (लिस्टेड) कोई भी कंपनी फंड जुटाने के लिए सार्वजिनक तौर पर अपने शेयर बेचने की पेशकश करती है तो इसे फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर ( FPO ) कहते हैं। 

जब पहली बार कंपनी अपने इक्विटी शेयर को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट करती है और सार्वजनिक रूप से कारोबार करती है, तो वो IPO कहलाता है जबकि एक से अधिक बार यदि कोई कंपनी अपने इक्विटी शेयरों की सार्वजनिक पेशकश करती है तो वो FPO कहलाती है FPO को  Further Public Offer भी कहा जता है। FPO का मुख्य उद्देश्य अतिरिक्त पूंजी जुटाना होता है।

IPO की तरह FPO में भी मर्चेंट बैंकर की जरूरत पड़ती है जो रेड हेयरिंग प्रोस्पेक्टस बनाकर SEBI (Securities and Exchange Board of India) को देता है और सेबी की मंजूरी के बाद ही बिडिंग शुरू की जाती है, बुक बिल्डिंग के बाद कट ऑफ प्राइस तय होते ही उन्हें शेयर बाजार पर लिस्ट कर दिया जाता है और शेयर एलॉट कर दिए जाते हैं। कट ऑफ प्राइस शेयरों की माँग के आधार पर तय होता है।


FPO के प्रकार- 


  • Dilutive FPO – अगर कंपनी किसी FPO में अपने नए शेयर जारी करके बेचती है, तो उस FPO को Dilutive FPO कहते हैं। नए शेयर बनाने से बाजार में कुल शेयर की संख्या बढ़ जाती है जिस से कंपनी का लाभ पहले से ज़्यादा शेयर मे बंटती है। इस स्थिति में एक शेयर के हिस्से में पहले से कम लाभ मिलेगा। इसलिए इसको इक्विटी Dilution कहते हैं और इस FPO को Dilutive FPO कहते हैं! यही कारण है कि जब कोई कंपनी Dilutive FPO लाने का ऐलान करती है, तब उस कंपनी के शेयर के दाम आम तौर पर गिरने लगते हैं, क्युकी इससे शेयर धारक को नुकसान होता है।

  • Non-Dilutive FPO– इस FPO में कंपनी नए शेयर जारी नहीं करती बल्कि कंपनी के Promotor अपने कुछ शेयर बेचते हैं। जिसके कारण  कोई Equity Dilution नहीं होता। इसलिए इस FPO को Non-dilutive FPO कहा जाता है।


IPO या FPO को लाने का कारण क्या है?

एक निवेशक के नाते आपके मन में सवाल आ सकता है कि कोई कंपनी IPO या FPO जनता को क्यों जारी करती है। जब किसी कंपनी को अतिरिक्त पूंजी ( धन ) की आवश्यकता होती है तो वह IPO या FPO जारी करती है। ये IPO या FPO कंपनी उस वक्त भी जारी कर सकती है जब उसके पास धन की कमी हो वह बाजार से कर्ज लेने के बजाय IPO या FPO से पैसा जुटाना ज्यादा बेहतर समझती है।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानि SEBI (Securities and Exchange Board of India) IPO या FPO लाने वाली कंपनियो के लिए एक सरकारी रेग्युलेटरी है। यह IPO या FPO लाने वाली कंपनियो से नियमों का सख्ती से पालन करवाती है। कंपनी हर तरह की जानकारी सेबी को देने के लिए बाध्य होती हैं। IPO या FPO के माध्यम से जुटाई गई धनराशि सामान्य रूप से कंपनी के विस्तार, उसके तकनीकी विकास, नई संपत्ति खरीदने हेतु, कर्जे समाप्त करने हेतु, इत्यादि के लिए उपयोग में लाई जाती है।

अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा की ए सेबी ( SEBI ) क्या है? और इसका क्या काम होता है शेयर मार्केट में, तो चलिए जानते है इसके बारे में विस्तार से-


SEBI Kya Hai in Hindi ( What id SEBI? )


सेबी(SEBI-Securities and Exchange Board of India) अर्थात भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड, SEBI की स्थापना वैसे तो 12 अप्रैल 1988 में एक गैर संवैधानिक निकाय के रूप में हुआ था। सेबी की स्थापना के बाद 30 जनवरी 1992 को भारत सरकार ने संसद में एक अध्यादेश के माध्यम से सेबी को एक संवैधानिक दर्जा दिया। सेबी का मुख्यालय मुंबई में स्थित है।

किसी भी बाजार या बिज़नेस को मॉनिटर करने के लिए एक संस्था की आवश्यकता होती है। जैसे भारत में बैंको को मॉनिटर करने के लिए RBI है, उसी तरह शेयर बाजार को मॉनिटर करने के लिए सेबी अस्तित्व में आया। दोस्तों बहुत से निवेशक शेयर बाजार में बहुत से कंपनियों के शेयर को खरीद और बिक्री किया करते हैं तो SEBI का काम होता है कंपनी, दलाल, निवेशक और सलाहकार पर निगरानी रखना ताकि इनमें से कोई भी निवेश करने बाले निवेशक के साथ धोका या जालसाजी न कर सके!

Share Bazaar में पैसा लगाने वाले निवेशको के साथ अगर कुछ गलत होता है तो निवेशक सेबी में अपना शिकायत दर्ज करा सकते हैं SEBI ट्रेडर्स और निवेशकों की शिकायतों को सुने और धोखाधड़ी करने वाले व्यक्ति या कंपनी पर जुर्माना लगाये या प्रतिबंध लगा सकती है! 


सेबी के आने से पहले, मार्केट में धोखाधड़ी या स्कैम बहुत सामान्य बात थी। आपको हर्षद मेहता का स्कैम तो याद ही होगा। कैसे हर्षद मेहता ने इनसाइडर ट्रेडिंग और अन्य इलीगल प्रैक्टिस के जरिए स्कैम किया था। 

इसके साथ ही, सेबी वित्तीय बाजार (Financial Market) में स्टॉक एक्सचेंज और म्यूचुअल फंड आदि के मामलों को देख रेख करता है, आपको पता होना चाहिए कि एक ब्रोकर को ट्रेडिंग सेवाएं प्रदान करने के लिए सेबी के साथ रजिस्टर्ड होना अनिवार्य है।

आसान शब्दों में बताऊ तो Share Market में कोई भी कंपनी, इन्वेस्टर,या ब्रोकर किसी तरह की कोई हेरा- फेरी ना कर पाए इसलिए उनके उपर नजर रखने के लिए सेबी होता है Investor और Trader के पैसों की सुरक्षा करना यही सेबी का Primary focus होता है!


सेबी का क्या काम होता है? ( SEBI Kya Kam Karata Hai? )


Investor और Trader के पैसों को सुरक्षा देने के अलावा सेबी और भी कई सारे काम करता है जैसे ,

  • कैपिटल मार्केट को बढ़ावा देना !
  • शेयर मार्केट को सही से चलाना !
  • इनसाइडर ट्रेडिंग को रोखना !
  • Mutual funds के नए-नए प्लान और स्कीम को रजिस्टर और रेगुलेट करना!
  • Stock exchange को सही से चलने के लिए रूल्स बनना और उन्हें रेगुलेट करना!
  • अगर शेयर मार्केट में किसी तरह की कोई चोरी या धोखाधड़ी होती है,तो सेबी उन पर डायरेक्ट एक्शन लेे सकता है !

दोस्तों अब तो आपको पता चल गया होगा की IPO और FPO क्या होता है और कंपनी इसे आम जनता के लिए क्यों ऑफर करती है तथा आप ये भी जान गये है की सेबी क्या होता है और इसका क्या काम होता है इसके अलाबा आप ये तो जानते ही होगे कि Share Bazaar में ट्रेडिंग या इन्वेस्टमेंट करने के लिए आपके पास Demat Account होना अनिवार्य है 


तभी आप Share Market में पैसा लगा सकते है लेकिन क्या आप जानते है की डीमेट अकाउंट क्या होता है और ट्रेडिंग अकाउंट क्या होता है अगर आपका जवाब है नही तो हम आपको बताते है कि Demat or Trading Account Kya Hota Hai in Hindi-



Demat Account क्या है? ( What is Demat Account? )


DEMAT का full form होता है “DEMATERIALISED, डीमेट अकाउंट ठीक आपके saving account की तरह होता है शेयर बाज़ार में इसका बहुत ही important role है जब आप कोई Share खरीदते हो तो उस खरीदे हुये शेयर को रखने के लिये आपको DEMAT Account की आवश्यकता होती है 

जिसमें हम अपने Shares रखते है और इसकी मदद से हम Shares को खरीद या बेच सकते है और जब आप शेयर को बेचते हो तो आपके DEMAT अकॉउंट से निकल कर खरीदने वाले के DEMAT अकॉउंट में चले जाता है। 

अगर आपको शेयर मार्केट में काम करना है या Shares मार्केट से पैसे कमाना है तो आपके पास Demat account होना बहुत जरूरी है बिना इसके हम न तो Shares को खरीद सकते है और ना ही बेच सकते है!



Trading Account क्या है? ( What is Trading Account )

ट्रेडिंग अकाउंट वह अकाउंट होता है जहाँ ख़रीदे हुए शेयर की कीमत चुकाने के लिए Trading Account की जरूरत पड़ती है, इसका उपयोग शेयर खरीद या बेचने के लिये Stock Brokers को आर्डर देने के लिये किया जाता है। जब हम कोई Share खरीदने के लिये कोई Order देते है 


तब वह order Complete होने के बाद आपके DEMAT अकॉउंट में आपके खरीदे शेयर मे जाते है और उस शेयर को खरीदने के लिए जितने पैसे चाहिए होते है वह आपके ट्रेडिंग अकॉउंट में से काट लिये जाते है। आपके TRADING ACCOUNT से शेयर के लिए जो भी पैसे होंगे वह ब्रोकर के कमीशन और टैक्स के साथ काट लिए जाते है।


तो दोस्तों अब आप ये तो जान ही गये होंगे की डीमेट और ट्रेडिंग अकाउंट क्या है और इनमे क्या अंतर है, लेकिन क्या आप यह जानते है कि share market में Equity और Commodity क्या है और इनके बीच क्या अंतर है, हम आपको बता दे की शेयर बाज़ार में कोई भी व्यक्ति दो तरह से निवेश कर सकता है क्योकि शेयर मार्केट में दो तरह का बाज़ार लगता है इक्विटी और कमोडिटी !

लेकिन इक्विटी और कमोडिटी के बीच के अंतर को समझने से पहले आपको इक्विटी और कमोडिटी के बारे में पता होना चाहिए, Equity Kya Hai? और Commodity Kya Hai? पहले ये जानते है-


इक्विटी क्या है? ( What is Equity )


कभी भी कोई निवेशक या ट्रेडर किसी कंपनी के शेयर खरीदने की बात करता है, तो संभवत वहां इक्विटी शेयर के बारे में बात हो रही होती है, इक्विटी को कंपनी में शेयरधारकों की हिस्सेदारी के रूप में समझा जा सकता है। शेयरधारक ने जो भी हिस्सेदारी इक्विटी द्वारा दर्शाई है और एक बैलेंस शीट पर बताई जाती है। 

इक्विटी को आमतौर पर किसी कंपनी का बुक वैल्यू कहा जाता है, आसान शब्दों में कहें तो जब हम किसी कंपनी के शेयर खरीदते हैं तो इक्विटी शेयर कहलाता है इक्विटी शेयरों से जुड़े हुए फंड को इक्विटी फंड कहते हैं इक्विटी शेयरों की खरीद और बिक्री स्टॉक एक्सचेंज ( NSE/BSE ) पर होती है!


कमोडिटी क्या है? ( What is Commodity )


कमर्शियल मार्केट में एक आवश्यक वस्तु जिसे आप कुछ अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं वह है कमोडिटी, कच्चे माल को संदर्भित करती है जब हम सोना पीतल कच्चा तेल सोयाबीन चना आदि खरीदते हैं तो हमें कमोडिटी बाजार में ट्रेड करना होता है जिसे कमोडिटी ट्रेडिंग या कमोडिटी बाजार कहते हैं! जैसे तेल, एग्रीकल्चर, लाइव स्टॉक आदि।

कमोडिटी को सीधे फ्यूचर और ऑप्शन के जरिए मार्केट में खरीदा और बेचा जा सकता है। कमोडिटी बाजार में हम गेहूं सोयाबीन कच्चा तेल आदि के मौजूदा भाव को अगले निर्धारित समय तक के लिए अदा करने के लिए बाध्य हो जाते हैं 


कमोडिटी बाजार के अलग स्टॉक एक्सचेंज होते हैं जैसे इंडियन कमोडिटी एक्सचेंज लिमिटेड मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज लिमिटेड ! commodity market में की गई ट्रेडिंग को हम कमोडिटी ट्रेडिंग कहते हैं!

आसान शब्दों में कहें तो इक्विटी शेयर किसी बैंक सेक्टर फार्मा सेक्टर के शेयर आप खरीदते हैं और भाव बढ़ने पर आप बेचकर मुनाफा कमाते हैं उसी प्रकार कमोडिटी बाजार में भी कोई धातु कच्चा तेल आदि की खरीद बिक्री कर कमाई करते हैं!

मैं उम्मीद करूंगा की आपको मेरी बात समझ में आई होगी,  और भी ऐसी बहुत सी चीजे है जो आपको शेयर मार्किट में इन्वेस्ट करने से पहले जान लेना चाहीऐ तो बस आपको इस लेख को अंत तक पूरा पढना है!



Stock Market Me Volume Kya Hota Hai? ( What is Volume in Stock Market )


वॉल्यूम, जैसा कि सामान्य अर्थ में समझा जाता है, को कुल संख्या के रूप में गिना जाता है, और स्टॉक मार्केट के समबन्ध में वॉल्यूम का अर्थ होता है, किसी स्टॉक में होने वाली खरीद और विक्री की मात्रा (कुल संख्या -वॉल्यूम ) से होता है। 

शेयर बाजार में वॉल्यूम सबसे उपयोगी इंडिकेटर में से एक है। ज्यादातर ट्रेडर और निवेशकों वॉल्यूम को ट्रेड प्लेस करते हुए अनदेखी कर देते है। इसलिए आज इस पोस्ट में, हम बात करेंगे What is Volume in Share Market in Hindi?

शेयर बाजार शब्दावली में, यह  व्यापार अवधि के दौरान यानी समय की एक निर्धारित अवधि के भीतर वास्तव में कारोबार कर रहे शेयरों की संख्या (जो खरीदे एवं बेचे गए हो) के रूप में मापा जाता है। वॉल्यूम, शेयरों के कुल कारोबार की माप है। 


वॉल्यूम एक ऐसा टूल है जो यह बताता है कि एक निश्चित टाइम पीरियड में कितने शेयर को खरीदा और बेचा गया है यह ट्रेंड और पैटर्न की एनालिसिस करने में मदद करता है। अगर आपको अभी भी समझ में नही आया है तो इसे उदाहरण से समझते है-

उदाहरण के लिए मान लेते है, मैंने रिलायंस के जो 1000 शेयर ख़रीदे वो मेरे दोस्त ने 1000 शेयर बेचे थे , तो इन दोनों सौदे के बाद स्टॉक का Trade volume कितना होना चाहिए-

कुछ लोगो का जवाब होगा 1000 शेयर ख़रीदे गए और 1000 शेयर बेचे गए, इसका मतलब वॉल्यूम 2000 होगा, जो कि एक गलत जवाब है, सही जवाब ये है कि – मैंने 1000 शेयर कितनी संख्या में ख़रीदे बेचे गए तो ध्यान से देखे तो पता चलता है कि – दोस्त ने 1000 शेयर बेचे और मैंने वही 1000 शेयर ख़रीदे और इसलिए शेयर का वॉल्यूम तो 1000 ही हुआ! 

ध्यान देने वाली बात है कि जब भी आप किसी स्टॉक के volume और उसके प्राइस को एक साथ मिलाकर देखेंगे तो आपको बहुत कुछ समझ आएगा, volume और price मिलकर वास्तव में मजबूत ट्रेंड बनाते है, वॉल्यूम और price के इस सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए मार्केट में अपनी पोजीशन को सेट कर सकते है!

आइये हम एक टेबल के द्वारा वॉल्यूम  और Trend के बीच के सम्बन्ध और उसके आधार पर Market के Trend को समझने की कोशिस करते है –

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  • यदि वॉल्यूम और प्राइस दोनों बढ़ जाते हैं, तो इससे आगे के ट्रेडिंग सेशन में स्टॉक पर बुलिश देखने को मिलेगी प्राइस और वॉल्यूम का इस तरह से बढ़ना ये बताता है कि – ऐसा हो सकता है कि उस स्टॉक को कोई बढ़ा इन्वेस्टर (जैसे FII , DII, MF) स्टॉक खरीद रहे है, और इसलिए स्टॉक के प्राइस कुछ समय तक बढ़ते ही रहेंगे, और इस कारण हमें STRONG BULLISH को ध्यान में रखते हुए, स्टॉक खरीदना चाहिए और जैसे ही प्राइस और VOLUME में करेक्शन आने लगे, तो हमें पर्याप्त प्रॉफिट बुक करके सौदे से बाहर निकाल जाना चाहिए!

  • यदि वॉल्यूम और प्राइस दोनों घट रहे हैं तो इसका मतलब है कि खुदरा ट्रेडर के भागीदारी के कारण कीमत कम हो रही है, न कि संस्थागत निवेशकों की बिक्री के कारण। प्राइस और वॉल्यूम का इस तरह से कम होना हमें ये बताता है कि – ऐसा हो सकता है कि उस स्टॉक को कोई बढ़ा इन्वेस्टर (जैसे FII , DII, MF) स्टॉक बेच रहे है, और इसलिए Strong Bearish Trend के कारण स्टॉक के प्राइस कुछ समय तक कम होते ही रहेंगे साथ ही इस तरह घटती हुई प्राइस और वॉल्यूम को ध्यान में रखना चाहिए, और जैसे ही प्राइस और VOLUME में करेक्शन आने लगे, यानि प्राइस और वॉल्यूम बहुत निचे जाकर, ऊपर की तरफ जाने लगे तो तो हमें पर्याप्त प्रॉफिट बुक करके सौदे से बाहर निकाल जाना चाहिए!

  • अगर वॉल्यूम बढ़ रहा है लेकिन स्टॉक की कीमत घट रही है, तो बड़े निवेशक बेच रहे हैं, इसका मतलब है , स्टॉक में कोई बड़ी selling चालू  है इसी कारण स्टॉक का volume तो बढ़ रहा है, लेकिन खरीदने वाले कम है और इसलिए स्टॉक के भाव नहीं बढ़ रहे है! इस तरह के सिचुएशन में नियम ये है कि – आम निवेशक को इन बड़े प्लेयर के साथ ही चलना चाहिए और Short Sellng के मौके की तलाश करनी चाहिए

  • यदि वॉल्यूम कम हो रहा है लेकिन स्टॉक की प्राइस बढ़ रही है तो संस्थागत निवेशकों की बजाय रिटेल भागीदारी हो रही है। ऐसी स्थिति से बचने की आवश्यकता है क्योंकि यह एक बुल ट्रैप हो सकता है। इसका मतलब है , स्टॉक में रिटेल इन्वेस्टर का ज्यादा इंटरेस्ट है, और रिटेल इन्वेस्टर उस स्टॉक में खरीदी कर रहे है, लेकिन क्योकि कोई बड़ा इन्वेस्टर (जैसे FII , DII, MF) नहीं है, इसलिए स्टॉक में volume भी नहीं है, और ऐसे केस में आम निवेशक को सावधान रहना चाहिए क्योकि बड़ा निवेशक नहीं है, और छोटे निवेशक स्टॉक को खरीद रहे है, भाव बढ़ रहा है, और ऐसे में बुलिश ट्रेंड देखने को मिल जाता है!

आप किसी भी तरह के ट्रेड लीजिए, stock खरीद रहे है या short selling कर रहे है,  चाहे आप इंट्रा डे कर रहे, स्विंग ट्रेडिंग कर रहे हो, या लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्ट कर रहे हो, वॉल्यूम को ध्यान में रखना अनिवार्य माना जाता है!

  1. वॉल्यूम से साफ़ दीखता है कि जो भी ट्रेंड बना है, चाहे वो Bullish हो या bearish, वो ट्रेंड कितना मजबूत है या कितना कमजोर,
  2. वॉल्यूम अधिक होने का मतलब है कि – जो भी ट्रेंड बना है, चाहे वो Bullish हो या bearish वो ट्रेंड स्ट्रोंग है, और सौदे हमें स्ट्रोंग ट्रेंड के साथ में ही करने चाहिए, चाहे स्टॉक खरीदने की बात हो या short selling की
  3. वॉल्यूम को देख लेने से हमें किसी तरह के Bullish या Bearish Trend के झूठे जाल से बच सकते है, क्योकि ऐसा हो सकता है कि मार्केट में बुलिश ट्रेंड दिख रहा है, लेकिन हो सकता है वो कुछ समय के लिए ही हो और ये हमें उस स्टॉक के वॉल्यूम को देख कर ही समझ आता है



अभी आप इस लेख के माध्यम से शेयर कितने प्रकार के होते है? ( How many Types of Share in Hindi ), IPO Kya Hota Hai? ( IPO क्या है? ), FPO Kya Hota Hai? ( FPO क्या है? ),  Trading और Demat Account क्या है?, सेबी क्या है? Equity और Commodity Kya Hai in Hindi ), Stock Market Me Volume Kya Hota Hai? जान गये होगे 

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