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नवरात्री क्यों मनाई जाती है, नवरात्री कब है- जाने नवरात्री के नौ दिनों का महत्व

इस लेख में हम आपको बताएगे की नवरात्री क्यों मनाई जाती है- नवरात्री मनानें के पीछे क्या कारण है, 2020 में नवरात्री कब है और नवरात्री के नौ दिनों के महत्त्व के बारे में हम आपको बतायेगे तो आईये जानते है नवरात्री क्यों मनाई जाती है, नवरात्री कब है- और नवरात्री के नौ दिनों के महत्त्व-

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Navratri Kab Hai- Navratri Kyo Mnayi Jati Hai





नवरात्रि का त्योहार साल में दो बार मनाया जाता है, नवरात्रि के समय प्रकृति में कई तरह के बदलाव होते है और नवरात्रि का त्योहार मौसम के अनुकूल माना जाता है जो शरीर में ऊर्जा को बढ़ाता है यह वह समय होता है जब प्रकृति बड़े बदलाव के समय से गुजर रही होती है और इसका स्वागत नवरात्रि के माध्यम से देवी शक्तियों द्वारा किया जाता है जो स्वयं प्रकृति का अवतार है नवरात्रि का त्योहार प्रकृति के अनुकूल ही मनाया जाता है यह वह समय होता है जब कोई भी बड़ा समारोह किया का सकता है|


इन दिनों भक्त नवरात्रि में मा दुर्गा का आवाहन करते है जो ब्रहंड की सर्वोच्च ऊर्जा का प्रधिनित्य करती है, वह अंतर्निहित ऊर्जा है जो संरक्षण और विनाश के कार्य को पूरा करती है दुर्गा का अर्थ दुखो को दूर करने वाला है भक्तगण उनकी आराधना करते है और अकमना की देवी दुर्गा उनके दुखो को दूर करे और उनके जीवन में सुख समृद्धि आए और वो अपने जीवन में  अच्छी तरह से आनंदित हो सके|


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विश्व के कई देशों में नवरात्रि पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, यह त्योहार पूरे नौ दिन तक चलता है भक्तजन घटस्थापना करके नौ दिनों तक मां दुर्गा जी की आराधना करते हैं, नौ दिनों तक मां की पूजा उनके अलग अलग रूपों में की जाती है, नौ दिनों तक चलने वाला यह त्योहार भक्त बहुत ही धूमधाम से मनाते है तो आइये जानते है आखिर नवरात्री क्यों मनाई जाती है-




नवरात्री क्यों मनाई जाती है-नवरात्री मनाने के पीछे क्या कारण है?



शास्त्रों में नवरात्रि का त्योहार मनाए जाने के पीछे दो कारण बताए गए हैं, पहली पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नाम का एक राक्षस था जो ब्रह्मा जी का बड़ा भक्त था। उसने अपने तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके एक वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान में उसे कोई देव, दानव या पृथ्वी पर रहने वाला कोई मनुष्य  मार ना पाए। वरदान प्राप्त करते ही वह बहुत निर्दयी हो गया और तीनो लोकों में आतंक माचने लगा। उसके आतंक से परेशान होकर देवी-देवताओं ने  ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ मिलकर माँ शक्ति के रूप में दुर्गा को जन्म दिया। माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और दसवें दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है|


एक दूसरी कथा के अनुसार, भगवान राम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले शक्ति की देवी माँ भगवती की आराधना की थी। रामेश्वरम में उन्होंने नौ दिनों तक माता की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने श्रीराम को लंका में विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। दसवें दिन भगवान राम ने लकां नरेश रावण को युद्ध में हराकर उसका वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। इस दिन को विजय दशमी के रूप में जाना जाता है।









2020 में नवरात्री कब है- Navratri Date and Time और शुभमुहूर्त 



कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त:-


प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – अक्तूबर 17, 2020 को 01:00 AM

प्रतिपदा तिथि समाप्त- अक्तूबर 17, 2020 को 09:08 PM

घट स्थापना मुहूर्त का समय प्रात:काल 06:27 बजे से 10:13 बजे तक

अभिजित मुहूर्त प्रात:काल 11:44 बजे से 12:29 बजे तक



शारदीय नवरात्रि तिथि 2020


प्रतिपदा—   17 अक्तूबर 2020

द्वितीया—   18 अक्तूबर 2020 

तृतीया—   19 अक्तूबर 2020 

चतुर्थी—   20 अक्तूबर 2020 

पंचमी—   21 अक्तूबर 2020

षष्ठी—   22 अक्तूबर 2020

सप्तमी—   23 अक्तूबर 2020

अष्टमी—   24 अक्तूबर 2020

नवमी—   25 अक्तूबर 2020





जाने नवरात्री के नौ दिनों का महत्त्व



नवरात्रि में देवी के नौ रूपो की पूजा अर्चना की जाती है जिनमे देवी के नौ रूपो का वर्णन है|


17 अक्टूबर- मां शैलपुत्री पूजा, घटस्थापना

18 अक्टूबर- मां ब्रह्मचारिणी पूजा

19 अक्टूबर- मां चंद्रघंटा पूजा

20 अक्टूबर- मां कुष्मांडा पूजा

21 अक्टूबर- मां स्कंदमाता पूजा

22 अक्टूबर- षष्ठी मां कात्यायनी पूजा

23 अक्टूबर- मां कालरात्रि पूजा

24 अक्टूबर- मां महागौरी दुर्गा पूजा

25 अक्टूबर- मां सिद्धिदात्री पूजा



शैलपुत्री:-

माता शैलपुत्री को पर्वतों के राजा हिमालय की बेटी हैं। देवी का वाहन बैल या वृषभ है इसलिए उनका एक नाम वृषोरूढ़ा भी है। साथ ही भक्त उन्हें उमा के नाम से जानते हैं। नवरात्र में मां शैलपुत्री की पूजा पहले दिन की जाती है। माता दाहिनी हाथ में सदैव त्रिशूल धारण की रहती हैं तथा इसी त्रिशूल से वह शत्रुओं का नाश करती हैं। उनके बाएं हाथ में कमल का फूल रहता है जो शांति तथा ज्ञान का प्रतीक है|


ब्रह्मचारिणी:-

देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है। मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा।





चंद्रघंटा:-

देवी चंद्रघंटा मां दुर्गा का ही शक्ति रूप है। जो सम्पूर्ण जगत की पीड़ा का नाश करती हैं और इनकी पूजा की वजह से ही नवरात्रि के तीसरे दिन को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है।देवी चंद्रघंटा के सिर पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र नजर आता है। यही वजह है कि माता के इस रूप का नाम चंद्रघंटा पड़ गया। माता के इस रूप के पूजन से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है देवी चंद्रघंटा का शरीर सोने के समान कांतिवान है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र हैं।देवी के हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र धारण किए हुए हैं। इनके कंठ में सफेद पुष्प की माला और रत्नजड़ित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है।देवी चंद्रघंटा भक्तों को अभय देने वाली तथा परम कल्याणकारी हैं। इनके रुप और गुणों के अनुसार इनकी पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा सिंह की सवारी करती है।


कूष्माण्डा:-
 
नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। मां का ये रूप बेहद ही शांत, सौम्य और मोहक है। इनकी आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा कहते हैं । इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है।नवरात्रि के चौथे दिन देवी के कुष्मांडा स्वरूप की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप सूर्य से संबंधित है। इनकी पूजा से सूर्य ग्रह से मिल रही पीड़ाएं दूर हो जाती है। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। आर्थिक तरक्की होती है।नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी की उपासना के लिए हरे रंग का उपयोग लाभदायक रहेगा।माता के चौथे स्वरूप की उपासना करने से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। देवी के इस रूप की कृपा से निर्णंय लेने की क्षमता में वृद्धि एवं मानसिक शक्ति अच्छी रहती हैं। इस तिथि को मालपुआ का भोग लगाना अच्छा होता है|



स्कंदमाता:-
 
नवरात्रि के पंचम दिन मा स्कंदमाता की पूजा की जाती है मा स्कंदमाता अपनी गोद अपने पुत्र को उठाए नजर आती है मा स्कंदमाता भक्त के हितों को सभरने वाली है और उन पर शीघ्र ही प्रसन्न हो जाती है कहते ह मा स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है सूर्य मंडल की आधिशाती देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक और तेजमय हो जाता है पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान स्कन्द यानी कार्तिकेय के नाम से जाने जाते है| 

ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे कुमार कार्तिकेय को पुराणों में कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमाओ का वर्णन किया गया है भगवान स्कन्द की माता होने कि वजह से दुर्गा जी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है वहीं इस स्वरूप में कुमार स्कन्द माता की गोद मेंबैठे दिखाई देते है और इसी से पता चलता है कि माता को अपन पुत्र बेहद प्रिय है स्कंदमाता को अपना पुत्र अपने नाम के साथ जोड़ना बेहद अच्छा लगता है| 

इसीलिए उन्हें ममता की देवी भी कहा जाता है कुमार स्कन्द के नाम के कारण ही इनका नाम स्कंदमाता  यानी स्कन्द की माता पड़ा है, मा स्कन्द माता की पूजा करने से भक्त के सारे काम हो जाते है और उनकी सारी इक्षाए पूरी हो जाती है|



कात्यायनी:-

माता कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है नवरात्रि के छठमे दिन माता कात्यायनी की पूजा की जाती है माता कात्यायनी ऋषि कत्ययान की पुत्री है माता कात्यायनी को शहद बहुत ही प्रिय है इसीलिए नवरात्रि के छाठमे दिन माता को शहद का भोग लगाया जाता है माता कायायनी का स्वरूप भूत ही सुन्दर एवम् भव्य और दिव्य है माता की चार भुजाएं है एवम् इनका वाहन सिंह है ।माता कात्यायनी की पूजाऔर आराधना  करने से भक्तों को अर्थ,काम ,धर्म और मोक्ष चारो की मनोकामना पूरी होती है माता की पूजा करने से रोग शोक संतप्त और भय समाप्त हो जाता है|

माता कात्यायनी की पूजा करने से सारी मनोकामना पूरी होती है और परम पद की प्राप्ति होती है इनकी पूजा अर्चना से सभी कस्टो का नाश होता है मा कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली है देवी कात्यायनी के आशीर्वाद से सभी देवता कष्ट से मुक्त हुए थे तो एक आम भक्त सभी कष्टों से छुटकारा क्यों नहीं पा सकता है|

कात्यायनी मा दुर्गा का छठा रूप है इनसे जुड़ी कथा है कि एक समय की बात है कि एक कत नाम से एक ऋषि थे उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए  उन्ही के नाम से प्रसिद्ध  कात्य गोत्र से विश्व प्रसिद्ध गुरु कात्यायन उत्पन्न हुए । उन्होंने भगवती परंबरा की उपासना करते हुए कठिन तपस्या की । उनकी इक्षा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म ले । 





माता ने उनकी यह प्राथना स्वीकार की ।कुछ समय पश्चात जब महिषासुर नमक रक्षक का अत्याचार जब बड़ गया था तब बहमा विष्णु और महेश ना अपने तेज और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था महर्षि कात्यायन ने इनकी इतनी पूजा की अर्चना की इसीलिए ये देवी कात्यायनी कहलाती है।



कालरात्रि:-

आकार में गोल है और इनका रंग काला है। मां के गले में नरमुंडों की माला है और इनकी सासों से अग्नि निकलती है। देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और यह गदर्भ की सवारी करती हैं। उनके दहिने हाथ अपने भक्तों को आर्शीवाद देते हुए है और इसके नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। मां के बायीं तरफ के ऊपरी हाथ में लोहे का कांटा और इसके नीचे वाले हाथ में खड्ग है। मां की उपासना से सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए मां की उपासना शुभकारी कहलायी गई है। मां कालरात्रि काल से भी रक्षा करती हैं। इसलिए इनके साधक को आकाल मृत्यु का भी भय नही होता।

मां कालरात्रि का रूप अत्ंयत ही भयानक है। जो दुष्टों के लिए काल का काम करता है और उनके भक्तों के लिए शुभ फल प्रदान करता है। देवी कालरात्रि की पूजा करने से भूत प्रेत, राक्षस, ग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि सभी नष्ट हो जाते हैं। अगर किसी की कुंडली में सभी ग्रह खराब हो या फिर अशुभ फल दे रहे हों तो नवरात्र के सातंवें दिन उस व्यक्ति को मां कालरात्रि की पूजा अवश्य ही करनी चाहिए। क्योंकि सभी नौ ग्रह मां कालरात्रि के आधीन है। मां कालरात्रि के आर्शीवाद से उनके भक्तों की सभी परेशानियां समाप्त हो जाती है|

पौराणक कथा के अनुसार एक बार तीनों लोकों में शुम्भ निशुम्भ और रक्तबीज तीनों राक्षसों ने आतंक मचा रखा था। इससे परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास इस समस्या के समाधान के लिए पहुंचे। तब भगवान शिव ने मां आदिशक्ति से उन तीनों का संहार करके अपने भक्तों को रक्षा के लिए कहा। इसके बाद माता पार्वती ने उन दुष्टों के संहार के लिए मां दुर्गा का रूप धारण कर लिया। मां ने शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध करके उनका अंत कर दिया। लेकिन जैसे ही मां ने रक्तबीज पर प्रहार किया उसके रक्त से अनेकों रक्तबीज उत्पन्न हो गए।

यह देखकर मां दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण कर लिया। इसके बाद मां कालरात्रि ने रक्तबीज पर प्रहार करना शुरु कर दिया और उसके रक्त को अपने मुंह में भर लिया और रक्तबीज का गला काट दिया। मां का शरीर रात से भी ज्यादा काला है। देवी कालरात्रि के बाल बिखरे हुए हैं और मां के गले में नर मुंडों की माला विराजित है। मां के चार हाथ हैं जिनमें से एक हाथ में कटार और दूसरे में लोहे का कांटा है। देवी के तीन नेत्र हैं और इनकी सांस से अग्नि निकलती है। मां का वाहन गधा है|

ॐ यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि।।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमाऽऽपदः ॐ।



महागौरी:-

नवरात्र के आठवें दिन आठवीं दुर्गा यानि की महागौरी की पूजा अर्चना और आराधना की जाती है। कहते हैं अपनी कठीन तपस्या से मां ने गौर वर्ण प्राप्त किया था। तभी से इन्हें उज्जवला स्वरूपा महागौरी, धन ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी त्रैलोक्य पूज्य मंगला, शारीरिक मानसिक और सांसारिक ताप का हरण करने वाली माता महागौरी का नाम दिया गया।

देवी दुर्गा के नौ रूपों में महागौरी आठवीं शक्ति स्वरूपा हैं। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है।महागौरी आदी शक्ति हैं। इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाश-मान होता है।इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी है। देवी महागौरी की अराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और देवी का भक्त जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी बनता है|

महागौरी सदैव मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं. माता की पूजा अर्चना करने के लिए एक सरल मंत्र है-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥



सिद्धिदात्री:-

आज चैत्र नवरात्रि का नौवां दिन है, यह महानवमी या दुर्गा नवमी के नाम से लोकप्रिय है। महानवमी के दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना होती है। आज के दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना से भक्तों के सभी शोक, भय और रोग का नाश हो जाता है। श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करने से समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां सिद्धिदात्री जीवन में होने वाली अनहोनी से भी रक्षा करती हैं, वह मोक्ष दायिनी भी हैं। 

गवान शिव भी मां सिद्धिदात्री का आराधना करते हैं। आज महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री के बीज मंत्र, प्रार्थना तथा स्तुति मंत्र का स्मरण करें और फिर मां सिद्धिदात्री की आरती करें। आपकी पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर देवी सिद्धिदात्री आपकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करेंगी।

देवी पुराण में ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शंकर ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। ये कमल पर आसीन हैं और केवल मानव ही नहीं बल्कि सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता और असुर सभी इनकी आराधना करते हैं। संसार में सभी वस्तुओं को सहज और सुलभता से प्राप्त करने के लिए नवरात्र के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है। इनका स्वरुप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है।

या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।





इस लेख में आपने जाना कि नवरात्री क्यों मनाई जाती है, नवरात्री कब है 2020 में और नवरात्री के नौ दिनों के महत्व के बारे में भी जाना अगर आपको ये पसंद आया है तो हमे आप नीचे कमेंट करके बता सकते है|


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